महाशिवरात्रि हमें केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह आत्मजागरण का संदेश देती है। शिव स्वयं योग के प्रतीक हैं:- योगाचार्य महेश पाल

मोहन शर्मा म्याना

महाशिवरात्रि हमें केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह आत्मजागरण का संदेश देती है। शिव स्वयं योग के प्रतीक हैं:- योगाचार्य महेश पाल

महाशिवरात्रि पर योग का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि चेतना को जागृत करने की एक दिव्य रात्रि है। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि यह वह पावन अवसर है जब संपूर्ण सृष्टि शिवतत्व की ऊर्जा से स्पंदित होती है। शिव को आदि योगी कहा गया है — वह प्रथम गुरु जिन्होंने मानवता को योग का ज्ञान प्रदान किया। भारतीय योग परंपरा के अनुसार सप्तऋषियों को योग का उपदेश देने वाले स्वयं भगवान शिव थे। यही कारण है कि महाशिवरात्रि योग, ध्यान और आत्म-साक्षात्कार के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है, पुराणों में वर्णित है कि इस रात्रि में भगवान शिव का दिव्य तांडव हुआ तथा उनका विवाह माता पार्वती से संपन्न हुआ। परंतु योग दर्शन में महाशिवरात्रि का अर्थ है — अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर यात्रा। शिव पुराण और लिंग पुराण में शिव को तप, ध्यान और समाधि का प्रतीक बताया गया है। शिव की मुद्रा स्वयं ध्यानमग्न योगी की है अर्धनिमीलित नेत्र, स्थिर देह, शांत श्वास। धार्मिक रूप से इस दिन व्रत, जप, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, परंतु योग की दृष्टि से यह रात्रि आत्मचिंतन, ध्यान और अंतर्मुखी होने का अवसर है योग का शाब्दिक अर्थ है — जोड़ना। अर्थात आत्मा का परमात्मा से मिलन। पतंजलि योगसूत्र में कहा गया है — “योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। महाशिवरात्रि की रात्रि में पृथ्वी की ऊर्जा विशेष प्रकार से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। इसलिए इस दिन सीधी रीढ़ के साथ ध्यान में बैठना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। आध्यात्मिक साधना में यह रात्रि कुंडलिनी जागरण और चेतना विस्तार का प्रतीक है। शिव का स्वरूप हमें सिखाता है विष को भी नीलकंठ बनकर धारण करना (जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करना) श्मशान में निवास (अहंकार का त्याग) गंगा को धारण करना (ज्ञान का प्रवाह) योग इन सभी गुणों को जीवन में उतारने का माध्यम है आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि ध्यान और प्राणायाम शरीर और मस्तिष्क पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।मस्तिष्क पर प्रभाव – ध्यान करने से अल्फा और थीटा ब्रेन वेव्स बढ़ती हैं, जिससे मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है। हार्मोन संतुलन – नियमित योगाभ्यास से कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) कम होता है। इम्यूनिटी में वृद्धि –प्राणायाम से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। रीढ़ सीधी रखने का महत्व – वैज्ञानिक दृष्टि से जब हम सीधी रीढ़ के साथ बैठते हैं तो नर्वस सिस्टम संतुलित रहता है और ऊर्जा प्रवाह बेहतर होता है। रात्रि जागरण के दौरान यदि व्यक्ति ध्यान में बैठता है तो उसका मस्तिष्क अधिक सजग और संतुलित अवस्था में रहता है आज का जीवन अत्यधिक भागदौड़, तनाव, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल व्यस्तता से भरा हुआ है। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवनशैली बन चुका है। मानसिक तनाव से मुक्ति डिप्रेशन और एंग्जायटी में कमी हृदय रोग, मधुमेह, थायरॉइड जैसी बीमारियों में लाभ बच्चों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि युवाओं में आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा बुजुर्गों में लचीलापन और संतुलन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी यह मानता है कि जीवनशैली आधारित रोगों की रोकथाम में योग और शारीरिक सक्रियता अत्यंत प्रभावी हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना यह सिद्ध करता है कि योग अब केवल भारत की नहीं, बल्कि विश्व की धरोहर है। इस पावन अवसर पर निम्न साधनाएं विशेष फलदायी मानी जाती हैं— ओम् नमः शिवाय मंत्र जप के साथ ध्यान, नाड़ी शोधन प्राणायाम,महामृत्युंजय मंत्र का जप, मौन साधना और आत्मचिंतन, रात्रि में सीधी रीढ़ के साथ ध्यान करते हुए शिव तत्व का स्मरण करना चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। महाशिवरात्रि हमें केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह आत्मजागरण का संदेश देती है। शिव स्वयं योग के प्रतीक हैं — संतुलन, शांति और समाधि के प्रतीक। आज के आधुनिक युग में योग हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति का आधार बन चुका है। यदि हम महाशिवरात्रि के वास्तविक संदेश को समझें तो यह स्पष्ट होता है कि शिव की उपासना का सर्वोत्तम मार्ग है — योग, ध्यान और आत्मचिंतन। इस महाशिवरात्रि पर संकल्प लें कि हम योग को केवल एक दिन का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे।

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