आदिवासी महिला सरपंच को दी गाली , दबंगों ने बीच चौराहे पर पीटा, अब इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहीं सीताबाई बर्डे , रसूख के आगे झुका प्रशासन?
व्यवस्था पर तमाचा , निर्वाचित आदिवासी सरपंच की सुनवाई नहीं, अजाक थाने से लेकर एसडीएम दफ्तर तक चक्कर काट रही महिला जनप्रतिनिधि।
बड़ा सवाल , जब गांव की प्रथम नागरिक ही सुरक्षित नहीं और उसकी FIR नहीं हो रही, तो आम जनता किसके भरोसे रहेगी?
अड़ंगा , 16 लाख की लागत से बन रहे सामुदायिक भवन का काम बंद, दबंगों ने सरेआम मांगा 10% कमीशन।
काटकूट/बड़वाह | “हमें भीलड़ा कहकर अपमानित किया गया, मेरे पति को पीटा गया और जब मैंने मदद के लिए साहबों अधिकारियों को फोन किया, तो कोई नहीं आया। क्या आदिवासी होना गुनाह है?” यह रुंधा हुआ गला ग्राम पंचायत काटकूट की निर्वाचित सरपंच सीताबाई बर्डे का है, जो आज न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। प्रदेश में एक तरफ ‘आदिवासी स्वाभिमान’ के नारे गूंज रहे हैं, वहीं दूसरी ओर काटकूट में एक आदिवासी महिला सरपंच का आत्मसम्मान रसूखदारों के पैरों तले रौंदा जा रहा है।
सत्ता की हनक सरकारी काम रोका, सरेआम की मारपीट
घटना तब शुरू हुई जब मेन चौराहे पर सांसद व विधायक निधि से 16 लाख रुपये की लागत से सर्वसमाज के लिए सामुदायिक भवन का निर्माण शुरू किया गया। सरपंच सीताबाई बर्डे के अनुसार, गांव के दबंग शिव जाट और दिनेश जाट ने अपने समर्थक अशोक पिता राजराम जाट , राम भरोश छितु , देवेन्द्र सुंदरलाल , राहुल पिता कान्हा , कनिराम ग्वाला , सुंदरलाल पिता छितु , आत्माराम पिता केशजी , कैलाश पिता केशजी मोजिरम पिता धानजी ,दीपक पिता कालु , संजय उर्फ कालु पिता शंकर , सचिन पिता दिनेश पटेल , शंकर पिता रंकिशन व अन्य लोगो को भेजकर जेसीबी रुकवा दी। जब सरपंच ने विरोध किया, तो उनके साथ अभद्रता की गई। दबंगों ने दो टूक कहा— “काम चालू करना है तो पहले 10 परसेंट कमीशन देना होगा।” विरोध करने पर सरपंच के साथ पति राकेश बर्डे के साथ भी मारपीट की गई और मजदूरों को जान से मारने की धमकी देकर भगा दिया गया। सभी घटना सीसीटीवी मे केद हो गई ओर काइल लोगो ने घटना का वीडियो बना लिया जो अब वाइरल हो रहा है
सिस्टम की संवेदनहीनता – मेडिकल हुआ, पर रिपोर्ट नहीं लिखी
हैरानी की बात यह है कि घटना के वक्त सरपंच ने बड़वाह एसडीएम सत्यनारायण दर्रो और बलवाड़ा थाना प्रभारी व काटकूट चौकी प्रभारी को फोन कर सुरक्षा की गुहार लगाई, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। आदिवासी महिला सरपंच का आरोप है कि पुलिस ने औपचारिकता के लिए मेडिकल तो करवा लिया, लेकिन दबंगों के खिलाफ अब तक FIR दर्ज नहीं की गई है। पुलिस और प्रशासन की यह चुप्पी अपराधियों के हौसले बुलंद कर रही है।
जब ‘मुखिया’ ही असुरक्षित, तो जनता का क्या होगा?
एक चुनी हुई जन प्रतिनिधि, जिसे संविधान ने गांव के विकास की जिम्मेदारी दी है, वह आज खुद को असहाय महसूस कर रही है। काटकूट के ग्रामीणों में यह सवाल तैर रहा है कि अगर एक सरपंच को अपनी सुरक्षा और सम्मान के लिए अजाक थाने की धूल फांकनी पड़ रही है, तो गांव की आम महिलाओं और गरीबों की सुनवाई इस तंत्र में कैसे होगी? क्या बड़वाह प्रशासन ने रसूखदारों के आगे घुटने टेक दिए हैं?
पंगु बना विकास, दहशत में पंचायत कर्मी
इस खौफनाक घटना के बाद से काटकूट में सामुदायिक भवन का काम ठप पड़ा है। दबंगों की धौंस इतनी है कि पंचायत के कर्मचारी और मजदूर काम पर लौटने से डर रहे हैं। शासकीय भूमि पर सरकारी पैसे से होने वाले विकास कार्य पर ‘निजी कब्जा’ करने की यह कोशिश प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर दाग है।
सरपंच सीताबाई बर्डे का दर्द: जो व्यवस्था को आइना दिखा रहा है
“मैंने हर दफ्तर का दरवाजा खटखटाया, अजाक थाने में लिखित शिकायत दी, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं और मुझे धमकियां मिल रही हैं। अगर एक महिला सरपंच की गरिमा सुरक्षित नहीं है, तो लाड़ली बहनों की सुरक्षा के दावे खोखले हैं। मैं हार नहीं मानूंगी, अपने समाज और पद के सम्मान के लिए आखिरी दम तक लड़ूंगी।”
वही सरपंच सीताबाई बर्डे ने कहा कि सीघ्र आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही नही की गई तो वह धरने पर बैठकर न्याय के लिए लडूंगी।
यह मामला अब केवल एक मारपीट की घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक पद की गरिमा का सवाल बन चुका है। क्या खरगोन जिला कलेक्टर भव्या मित्तल और पुलिस अधीक्षक रविन्द्र वर्मा इन रसूखदारों पर कानूनी शिकंजा कसेगा या फिर एक आदिवासी महिला की आवाज फाइलों में दबा दी जाएगी?
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